रविवार, २४ एप्रिल, २०१६

बदललेली शेती.


बदललेली  शेती !

बदलत्या  काळानुसार  बदलणे  प्रकृतीचा  नियम  आहे  हे  मान्य  केले  तरीहि  किती  बदलावे आणि  कुठे  थांबावे  हे  ठाऊक  नसल्यास  त्या बदलावांनी  कपाळमोक्ष  होण्याचीच  शक्यता अधिक !  

शेतीच्या  बाबतीतहि  अगदि  हेच  घडले.  बदलत्या  काळानुसार  शेतीच्या  पद्धतीहि  बदलल्या. पुर्वापार चालत  आलेली  मिश्र  पिक  पध्दती  आणि  सेंद्रिय  शेती  ज्यात  स्थानिक  हवामानापासून  ते  ऊपलब्ध  पाण्याच्या  नियोजनबध्द  वापरापर्यंत  आणि  रोग - किटकांच्या  प्रादुर्भावापासून  ते  एकच  एक  पिकाच्या  भरघोस  ऊत्पादनामुळे  होऊ  शकणार्या  आर्थिक  दुष्परिणामांपर्यंत अश्या  सर्व  बाबींचा  विचार  होऊन  त्याज्य  शेतमाल , पालापाचोळा , शेणापासून  ते  अगदि  टाकाऊ  केरकचर्यापर्यंत  स्वस्त ,  सहज  ऊपलब्ध  असलेल्या  साहित्याच्या  वापरातुन  सृष्टीच्या  पुन:र्प्रक्रियेच्या  चक्राचा  एक  भाग  बनुन  एकप्रकारे  तिने  आपल्यास  दिलेलेच  तिला  पुन्हा  सुपुर्द  करून  जमिनीचा  कस  नैसर्गिकरित्या  वाढवला  जाई. ह्यात पैसा व  पाण्याच्या  अमुल्य  बचतीसोबतच  जमिन  आणि  सृष्टीवर  होणारे  रासायनिक  शेतीचे  दुष्परिणाम  टाळले  जाऊन  ह्या  सर्वातुन  शेतकर्याचे  आर्थिक  संरक्षण  साधले  जाई.

कालांतराने  ह्या  पध्दती  मागे पडून  रासायनिक  खते ,  किटकनाशके , "नगदि पिक " , हायब्रीड  बियाण  ई.  चा  वापर  वाढत  गेल्याने  शेतीच्या  खर्चासोबतच  पाण्याचा  वापरहि  वाढला. त्यात प्रशासनाच्या  पाण्याच्या  नियोजनशुन्यतेमुळे  वाढत्या  पाण्याची  गरज  भागवण्यासाठी  आड - विहिरीहि  कमी  पडून  बोअरवेल्सचा  वापर  दिवसागणिक  वाढत  गेला. 

दुसरीकडे  रासायनिक  खत  आणि  पाण्याच्या  अतिवापराने  जमिनीचा  कस  कमी  होत  जाऊन  प्रतिहेक्टरी  ऊत्पादनात घट  होऊनहि  शेतकरी  वर्गाकडून  काहि ठराविक  पिकांना  मिळणार्या  प्राधान्यक्रमामुळे  एकुण  ऊत्पादन  मात्र  भरघोस  दिसून  दलाल - अडत्यांच्या  परंपरागत  वृत्तीमुळे  शेतमालाच्या  किमतीत  म्हणजेच  शेतकर्याच्या  ऊत्पन्नात  घट  होत  जाऊन  त्याचवेळी  आधुनिक  शेतीतल्या  वाढत्या  खर्चाने  बिघडलेल्या  गणितामुळे  कर्जबाजारीपणा  वाढत  गेला.  आणि  ह्या  सर्वांमध्येच  अमर्याद  पाणी  ऊपश्यापुढे  भुजलाच्या  नैसर्गिक  पुन:र्भरणाला  असलेल्या  मर्यादेचा  मात्र  विसर  पडल्याने  भुजलस्तर  घसरत  जाऊन  ऊत्तरोत्तर  बोअरवेल्सहि  निकामी  ठरू  लागली.

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