रविवार, २४ एप्रिल, २०१६

जलपर्णीप्रमाणेच  ह्या  भीषण  दुष्काळामुळे  दशकानुदशक  आपल्या सर्व  जलस्त्रोतांना  आतुन  गिळणार्या  गाळाला आपण  पाहू  शकलो  हि  दुष्काळाची आणखी  एक  चांगली  बाजु !  कारण  ह्या  गाळामुळे  जलस्त्रोतांच्या  साठवणक्षमतेवर  विपरीत  परिणाम  होण्यासोबतच  ह्या  नैसर्गिक  स्त्रोतांमधील  पाणी जमिनीत  झिरपण्यातहि  अडथळा  निर्माण  झाल्याने  त्याचा  भुजलावरहि  विपरीत  परिणाम  होतो  हा  स्थानिकांचा अनुभव  आहे. 

एरव्ही  पाणी  भरलेले  असताना  गाळ  ऊपसण्याचे  काम  कठीण  आणि   खार्चिक  झाले  असते. पण  सद्यस्थितीत  तुलनात्मकरित्या  कमी  खर्च  आणि  श्रमात हा  गाळ  ऊपसता येऊ  शकतो. त्यामुळे  ह्या  महत्वपुर्ण   जलस्त्रोतांच्या  साठवणक्षमतेत  लक्षणीय  सुधारणेसोबतच  ह्याच  गाळाने  दुष्काळी  भागातील  जमिनीचा  पोत  सुधरवल्यास  त्या जमिनीची  सुपिकताहि   वाढुन  अन्नधान्यासोबतच  वैरण , चारा  ई.    गोष्तेर्न्ही    जमिनीतुन  . सदैव  दुष्काळी  पट्ट्यातील   अधिक   प्रमाणक्त  पिक   गा ऊपसण्यासाठीचा  खर्च  आणि  मिळणारा  फायदा  ह्यांचे  गणित  खुप  फायदेशीर  ठरू  शकेल  असे  जाणकारांचे  मत  आहे. 

पण  मुळात हि  ह्यामागील  चांगली  बाजु  असुनहि  गाळाच्या रूपात  आपले  जलस्त्रोत बुजवणारे  संकट  पुर्णपणे  आटोक्यात  येईपर्यंत  त्यांच्यसोबत  आपल्या  सर्वांचेच  अस्तित्वहि  टांगणीला  लागलेले  असेल.  त्यामुळेच  डोंगर ऊतार व  बोडक्या  जमिनींना  त्यांच्या  हक्काचे  वृक्ष - झुडूपाचे  छत्र  परत  मिळवून  देऊन  जमिनीची  धुप  आटोक्यात आणण्यासाठीचे  शर्थीचे  प्रयत्न  करणे  अत्यावश्यक  आहे.   पण  तरीहि  हिरवळ  वाढुन  भुमीच्या  ह्या  जख्मा    भरून  निघण्यास  काहि  कालावधी  लागेलच. म्हणूनच  ह्या  सर्व  ऊपायांसोबतच  गाव - खेड्यांमध्ये  डोंगर  ऊतारांवर  समतल  चर   पाडण्यासारखे  ऊपाय  तातडीने  करता  येऊ  शकतात. 

निवृत्त  वनाधिकारी  वसंतराव  टाकळकर  (  ज्यांचे काहि  वर्षांपुर्वी  निधन झाले . ) ह्यांनी  सहकार्यांच्या  सहाय्याने तीव्र  डोंगर  ऊतारांवर  हजारो  कि.मी.  लांबीचे  समतल  चर    खोदुन  धावत्या  पाण्याला  चालते  केले .  समतल  चरांमुळे  डोंगरावरून  खाली  येणार्या  पाण्याचा  वेग  कमी  झाल्याने  जमिनीची  धुप  आटोक्यात  येऊन  डोंगरावरून  वाहून  वाया  जाणारे  हे  पाणी चरांमुळे  आधी  डोंगर  ऊतारांवर  झिरपून पुढे  डोंगराच्या  खालच्या  बाजुस  खास  बनवलेल्या  तलावात  भरू लागते.  अश्याप्रकारे  ह्या  चरांमुळे  पावसाच्या  पाण्यापासून  होणारी  डोंगर  ऊतारांची  झीज  थांबुन  त्याचवेळेस  डोंगरांवरून  तलाव , नद्यांमध्ये  वाहून  जाणार्या  प्रचंड  माती  व  गाळाचे  प्रमाणहि  लक्षणीयरित्या  कमी  होते     तसेच  ते  पाणी  आधी  डोंगर  ऊतारांवर  आणि  नंतर   डोंगराच्या  पायथ्याशी  असणार्या  तलावात   झिरपत  गेल्याने  ( पुर्वी  वाहून  जाणार्या )  आता    जमिनीत  मुरणार्या  ह्या  पाण्याने   भुगर्भातील  पाण्याच्या   पातळीतहि   लक्षणीय  वाढ  होऊन  त्याचा  आसपासच्या  क्षेत्रातील  आड - विहिरींच्या  पाण्याच्या  पातळीवर  आणि  ऊपलब्धतेवरहि  खुप  सकारात्मक  प्रभाव  पडतो.  पण त्याचवेळेस  प्रत्यक्ष  जीवनस्वरूप  अश्या  पावसाच्या  प्रत्येक थेंबातील  ऊर्जा   पकडण्यासाठी  शेततळी , बंधारे  अश्या  ऊपक्रमांद्वारे  दृश्य  पाण्यासोबतच  जमिनीखालील  ह्या अदृश्य  जीवन  संपत्तीच्या जख्मांवरहि  आपण  फुंकर  घालू  शकतो.  पण  एका  हाताने  देत  असता  बोअरवेल्ससारख्या  तंत्रज्ञानाच्या  दुसर्या  हाताने  भुमातेच्या  जख्मेवर  जंगली  किड्यांगत  तुटुन  पडणार्या  आपल्या  पाषवी  वृत्तीला  सर्वप्रथम  ठेचणे  अत्यावश्यक  आहे.

पण  तोच  पाशवी  हात  वरदान  ठरला  तर  मात्र   हा  वरदानाचा  हात  फिरल्यानेच   भुमातेच्या  अश्वत्थाम्यागत  चिरंजीव  जख्मा  क्षणार्धात  भरून  निघतील.

हो  मित्रांनो  हा  चमत्कार  प्रत्यक्ष  साकारू  शकतो. 


  2013 सालच्या  भीषण  दुष्काळाचे  रिपोर्टिंग करताना " Abp माझा  " चॅनलचे  ज्येष्ठ पत्रकार " राहुल  कुलकर्णी "  ह्यांनी  आपल्या  शोध  पत्रकारितेद्वारे  महाराष्ट्राच्या  कानाकोपर्यातील दुष्काळाच्या  भीषणतेमागील  कारणांचा  वेध  घेताना पिक - पाण्याच्या हव्यासापोटि    बोअरवेल्समध्ये   लागलेली  जीवघेणी  स्पर्धा  आणि त्या  स्पर्धेतुन  भुमीचे  हृद्य  छेदणारे  दुष्काळी  भीषण   वास्तव  समोर  आणले   आणि  त्यानंतर  ह्याच्याच  पुढच्या  भागात  ह्या  बोअरवेल्समध्ये  दडलेल्या  भुमातेचे  घाव  भरणार्या  ऊपचारांबद्दलहि   सांगितले.

अश्याप्रकारे  जमिनीच्या  जख्मा  भरणे  चमत्कार  वाटत  असल्यास अण्णा  हजारेंचे   राळेगणसिध्दी ,  हिवरेबाजार ह्या सारख्या  गावांनी  आत्मविश्वास  आणि  अथक  परिश्रमातुन  आपल्या  बाजुस    फिरवलेल्या  ग्रहदशेस   काय  म्हणावे  ? 
कोकणातील  दापोली  येथे तिथल्या  कृषिविद्यापिठाच्या  मार्गदर्शनातुन   सर्वसामान्य  नागरीकांनी  भर  ऊन्हाळ्यात  करपणार्या शेतीला   कुठल्याहि " ईंधन ,  विज  किंवा  अत्याधुनिक  तंत्रज्ञानाच्या  मदतीशिवाय "  चक्क  समुद्राच्या  पाण्यावर  फुलवले  त्या  चमत्कारास तर  खार  पाणी  गोड  करण्याच्या महागड्या   तंत्रज्ञानाने  आणि  दुष्काळात  त्या  तंत्रज्ञानाचा पुरस्कार  करणार्या  सर्व चमचा प्रजातीनेहि   साष्टांग  दडंवत  घातला  पाहिजे. पण  त्याऊलट  चमत्काराला  नमस्कार  करणारे  आपण  स्वातंत्र्यानंतरहि   ( प्रशासनाचे ईतके अनुभव  घेतल्यानंतरहि )  आजतागायत    प्रशासनाकडून  चमत्काराची  अपेक्षा का  ठेऊन  आहोत ???

त्यामुळे ह्यापुढे  दुष्काळावर  मात  करणारे   असे  खरेखुरे  आदर्श  समोर  ठेऊन  कृती  करणार्या  प्रत्यक्ष  लोकसहभाग असलेल्या  योजनांची आवश्यकता  आहे. अश्या योजनांमध्ये   शहर - गाव  अश्या प्रकारच्या  कुठल्याहि  सीमा  अडथळा  ठरू  नयेत .  ह्यात  आर्थिक  मदतीकरता  सरकारवर  दबाव  वाढवून  ती  मिळण्यास  अडथळे  येत असल्यास  शहर - महानगरातल्या  जनतेने  आपले  कर्तव्य  ओळखुन  आपल्या  ग्रामीण  बांधवांसोबत  त्यांच्या  श्रमशक्तीचा नाहि  तरी  निदान  आर्थिक  भार  ऊचलण्यास  त्यांच्या  खांद्यला  खांदा  लावून  ऊभ  रहाण्याची  हि  वेळ आहे.
कारण आपल्या  शरीरातील  रक्ताचे  शेतकर्याच्या  घामाशी असणार  सख्ख   नात  तुटल्यास  एकेक  घास  महाग  झाल्यावर  त्याचा  भार  आपल्याला  डोईजड  होण्याआधीच  सर्वांना  त्या  नात्याची  जाणीव  झाल्यास  ऊद्या  सर्वांच्याच  वाट्याला  दोन  सुखाचे  घास  येतील.

पण  मित्रांनो  त्याचसोबत  प्रशासनाच्या  सक्तीची  किंवा  मदतीची  वाट  न  पहाता  रेन  वॉटर  हार्वेस्टिंगसारख्या  योजनांसाठी  स्वत:च  पुढाकार  घेण्यासोबत  आज  शहर - महानगरांच्या  खाली  मरणासन्न  अवस्थेतील  भुजलास  नवजीवन  देण्यासाठी  कॉंक्रीटिकरणाचा  विळखा   जागोजागी   तोडण्याची  गरज  आहे.  ज्यायोगे  भुमीला  मोकळा  श्वास  घेता  येऊन  तिच्या  गर्भातील  "जीवन"हि  जगेल !

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